Friday, January 30, 2009

नवधा भक्ति कहहुं तोही पाही | सावधान सुनु धरु मन माहीं ||
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा| दुसरि रति मम कथा प्रसंगा ||

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान |
चौथि भगति मम गुन गन करे कपट तजि गान ||

मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा | पंचम भजन जो बेद प्रकाशा ||
छठ दम सील बिरति बहु करमा | निरत निरंतर सज्जन धरमा ||
सातवँ सम मोहि मय जग देखा | मोतें अधिक संत कर लेखा ||
आठवां जथा लाभ संतोषा | सपनेहूँ नहिं देखई पर दोषा ||
नवम सरल सब सन छल हीना | मम भरोश हिय हर्ष न दीना ||
नवमहूँ एकही जिन्ह के होई | नारी पुरूष सचराचर कोई ||
सोई अतिसय प्रिय भामिनी मोरें | सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ||

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