ज्ञान विवेक बिरति बिग्याना | मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना ||
आजु देऊन सब संसय नाही | मागु जो तोही भाव मन माहीं |१|
सुन प्रभु वचन अधिक अनुरागेउन | मन अनुमान करन तब लागेउ ||
प्रभु कह देन सकल सुख सही | भक्ति आपनी देन न कही |२|
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे | लवण बिना बहु बिंजन जैसे ||
भजन हीन सुख कवने काजा | अस विचारि बोलेउन खगराजा |३|
जो प्रभु होई प्रसन्न वर देहु | मो पर करहूँ कृपा अरु नेहू ||
मन भावत वर मांगों स्वामी | तुम्ह उदार उर अंतरजामी |४|
अबिरल भक्ति विशुद्ध तब श्रुति पुराण जो गाव |
जेहि खोजत जोगीश मुनि प्रभु प्रसाद कोऊ पाव |४ (क)|
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिन्धु सुखधाम |
सोई निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम |४ (ख)|
आजु देऊन सब संसय नाही | मागु जो तोही भाव मन माहीं |१|
सुन प्रभु वचन अधिक अनुरागेउन | मन अनुमान करन तब लागेउ ||
प्रभु कह देन सकल सुख सही | भक्ति आपनी देन न कही |२|
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे | लवण बिना बहु बिंजन जैसे ||
भजन हीन सुख कवने काजा | अस विचारि बोलेउन खगराजा |३|
जो प्रभु होई प्रसन्न वर देहु | मो पर करहूँ कृपा अरु नेहू ||
मन भावत वर मांगों स्वामी | तुम्ह उदार उर अंतरजामी |४|
अबिरल भक्ति विशुद्ध तब श्रुति पुराण जो गाव |
जेहि खोजत जोगीश मुनि प्रभु प्रसाद कोऊ पाव |४ (क)|
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिन्धु सुखधाम |
सोई निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम |४ (ख)|

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