Thursday, January 29, 2009

नर सहस्र महुं सुनहुँ पुरारी | कोउ एक होउ धर्मं व्रत धारी ||
धर्मशील कोटिक मंह कोई | बिषय बिमुख बिराग रत होई |1|
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई | सम्यक ज्ञान सकृत कोउ लहई||
ज्ञान वंत कोटिक मंह कोउ | जीवन मुक्त सकृत जग सोउ |२|
तिन्ह सहस्र महुं सब सुख खानी | दुर्लभ ब्रह्मलीन विज्ञानी ||
धर्मशील विरक्त अरु ज्ञानी | जीवन मुक्त ब्रह्मपर प्राणी |३|
सब ते सो दुलभ सुरराया | राम भगति रत गत मद माया |
सो हरिभगति काग किमी पायी | बिश्वनाथ मोहे कहहुं बुझाई |४|

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